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Thursday, December 30, 2010

आखिर सच हुआ सपना… कल तक चेहरा कांतिहीन था और पेशानी पर सलवटें थीं, मगर मार्क जब अपने मुल्क के लिए रवाना हुआ तो उसके चेहरे पर वैसा ही ओज था जो कभी युगांडा से भारत आते हुए रहा होगा.

आखिर सच हुआ सपना…

मार्क उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए भारत आए थे.
वो कोई 15 साल पहले युगांडा से ऊंची तालीम का ख्वाब लेकर भारत आया और फिर एक मुकदमे के भंवर में ऐसा फंसा कि उसे वतन लौटने की इजाज़त ही नहीं मिली.
अब लंबी कानूनी जंग के बाद युगांडा से आए मार्क जब बुधवार को जयपुर से युगांडा के लिए रवाना हुआ तो उसकी आँखे नम हो गई. मार्क एक अरसे बाद अपनी धरती को चूमेगा और अपनों से मुखातिब होगा.
ये मार्क की ज़िंदगी का दुस्वपन था. उसका पासपोर्ट पुलिस ने ज़ब्त कर लिया था और उसे देश छोड़ने की अनुमति नहीं थी.
दिल्ली के एक दम्पति मनीष सक्सेना और उनकी पत्नी चारू गुप्ता ने मार्क के वकील सुधीर को फोन कर मदद की पेशकश की और सहायता के लिए 12 हज़ार रुपए का बैंक ड्राफ्ट भेज दिया.
उसके पास ना रहने का ठिकाना था, न आय का कोई ज़रिया. मार्क पेट भरने के लिए घूम-घूम कर घड़िया बेचता था. मगर उसकी अपनी ज़िंदगी की घड़ी में गोया वक्त जैसे ठहर गया हो.

आसान नहीं थी राह

फिर वो घड़ी आई जब मार्क ने पापी पेट की दुहाई देकर अदालत से गुहार लगाई कि या तो उसे वतन लौटने दिया जाए या फिर उसे जेल में भेज दिया जाए. ताकि उसे दो जून की रोटी मिल सके.
अदालत ने उसे युगांडा जाने की इजाज़त दे दी है. उसे इस शर्त पर अनुमति मिली है कि वो दो माह बाद वापस भारत लौट कर कानूनी प्रक्रिया का सामना करेगा.
अपने जीवन के अमूल्य क्षण जयपुर में फ़क्कड़ रहकर और कानूनी लड़ाई में गुज़ार चुके मार्क के लिए अदालत से इजाज़त मिलने के बाद भी घर वापसी की राह आसान नहीं थी.
कल तक चेहरा कांतिहीन था और पेशानी पर सलवटें थीं, मगर मार्क जब अपने मुल्क के लिए रवाना हुआ तो उसके चेहरे पर वैसा ही ओज था जो कभी युगांडा से भारत आते हुए रहा होगा.
सरकार ने उस पर भारत में वीज़ा अवधि से ज्यादा समय रुकने के लिए 12 हज़ार रूपए का जुर्माना और लगा दिया. फिर उसे घर वापसी के लिए हवाई जहाज़ का किराया भी जुटाना था. मगर मार्क की कारुणिक कहानी बीबीसी ऑनलाइन के पर्दे पर आई तो कई हाथ मदद के लिए बढ़ गए.

मदद की पेशकश

दिल्ली के एक दम्पति मनीष सक्सेना और उनकी पत्नी चारू गुप्ता ने मार्क के वकील सुधीर को फोन कर मदद की पेशकश की और सहायता के लिए 12 हज़ार रुपए का बैंक ड्राफ्ट भेज दिया.
चारू आकाशवाणी में पत्रकार हैं कहने लगीं ये तो हमारा फर्ज़ था. मार्क के वकील सुधीर कहते हैं ये मदद मिलने के बाद जयपुर में बहुत लोग प्रेरित हुए और मार्क की यात्रा के लिए पैसे जमा हो गए.
जयपुर में बुधवार को मार्क को विदाई दी गई तो उसके हाथ में 31 हज़ार रूपए का हवाई यात्रा का टीकट, कुछ कपड़े, एक बैग और राह गुज़र के लिए छोटी सी रकम.
मार्क कहता है इन वर्षो में उसने अपनी माँ और एक भाई खो दिया. फिर भी उसके लिए यही बड़ी बात है कि वो अपने वतन वापस लौट रहा है.
कल तक चेहरा कांतिहीन था और पेशानी पर सलवटें थीं, मगर मार्क जब अपने मुल्क के लिए रवाना हुआ तो उसके चेहरे पर वैसा ही ओज था जो कभी युगांडा से भारत आते हुए रहा होगा.

Monday, December 27, 2010

एमनेस्टी इंटरनेशनल मानती है कि बिनायक सेन सच बोलने की सज़ा भुगत रहे हैं और उन्हें उन क़ानूनों के तहत सज़ा सुनाई गई है जो ज़ाहिर तौर पर अस्पष्ट है और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक क़ानूनों के मानकों के अनुरूप नहीं है

बिनायक सेन की रिहाई की मांग

बिनायक सेन
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बिनायक सेन की रिहाई की मांग की है.
एमनेस्टी इंटरनेशन का कहना है कि जिस क़ानून के तहत बिनायक सेन को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है वह अंतरराष्ट्रीय निष्पक्ष न्याय के मानकों का उल्लंघन करती है.
शुक्रवार को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक अदालत ने नक्सलियों को मदद करने के आरोप में देशद्रोह का दोषी पाया था और उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी.
मानवाधिकार के लिए काम करने वाली संस्था पीयूसीएल ने इस फ़ैसले को वाहियात बताया था और सीपीएम ने इस फ़ैसले को अन्यायपूर्ण बताया था.

राजनीतिक आरोप

एमनेस्टी इंटरनेशनल मानती है कि बिनायक सेन सच बोलने की सज़ा भुगत रहे हैं और उन्हें उन क़ानूनों के तहत सज़ा सुनाई गई है जो ज़ाहिर तौर पर अस्पष्ट है और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक क़ानूनों के मानकों के अनुरूप नहीं है
सैम ज़रीफ़ी, एमनेस्टी इंटरनेशनल
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि बिनायक सेन लोगों की शिकायतों को शांतिपूर्ण ढंग से उजागर कर रहे थे.
संस्था के एशिया-प्रशांत के निदेशक सैम ज़रीफ़ी ने कहा है, "बिनायक सेन के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और भारतीय अधिकारियों को चाहिए कि वे इन आरोपों को ख़त्म उन्हें रिहा करें."
समाचार एजेंसी एपी के अनुसार एक बयान में सैम जरीफ़ी ने कहा है, "एमनेस्टी इंटरनेशनल मानती है कि बिनायक सेन सच बोलने की सज़ा भुगत रहे हैं और उन्हें उन क़ानूनों के तहत सज़ा सुनाई गई है जो ज़ाहिर तौर पर अस्पष्ट है और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक क़ानूनों के मानकों के अनुरूप नहीं है."

सज़ा

रायपुर की अदालत ने बिनायक सेन को नक्सलियों के साथ साँठगाँठ और उनकी सहायता के आरोप में राजद्रोह और विद्रोह का दोषी पाया था.
उनके साथ नक्सली समर्थक नारायण सान्याल और कोलकाता के पीयूष गुहा को भी उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है.
डॉ. बिनायक सेन को मई, 2007 में बिलासपुर से गिरफ़्तार किया गया था.
उन पर आरोप लगाया गया था कि वे नक्सल समर्थक नारायण सान्याल का पत्र भूमिगत नक्सली नेताओं तक पहुँचाने जा रहे थे.
वे दो वर्षों तक जेल में रहे और आख़िर मई, 2009 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें ज़मानत मिल सकी थी.
लेकिन अदालत के इस फ़ैसले के बाद एक बार फिर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है.
बिनायक शुरु से राज्य सरकार के आरोपों का खंडन करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वो नक्सलियों का साथ नहीं देते लेकिन वो साथ ही राज्य सरकार की ज्यादतियों का भी विरोध करते रहे हैं.
छत्तीसगढ़ पुलिस ने जिस जनसुरक्षा अधिनियम के तहत बिनायक सेन को गिरफ़्तार किया था उस क़ानून का वे तब से विरोध कर रहे थे जब सरकार ने इसे लागू करने का फ़ैसला किया था.
उनका तर्क था कि इस क़ानून का सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के ख़िलाफ़ दुरुपयोग किया जा सकता है.
बहुत से सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस क़ानून को 'पोटा से भी ख़तरनाक' बताया था.

Friday, December 24, 2010

बिनायक सेन को देशद्रोह के लिए उम्रक़ैद ............बिनायक सेन को हुई सजा से इतना दुखी हूँ कि बोलने के लिए कोई शब्द नहीं हैं.ये भारत का दुर्भाग्य है कि असली देश द्रोही संसद और विधानमंडलों में बैठते हैं और देश के लिए काम करने वाले जेलों में.....................

बिनायक सेन को देशद्रोह के लिए उम्रक़ैद

बिनायक सेन (फ़ाइल फ़ोटो)
इससे पहले बिनायक सेन की रिहाई के लिए दुनिया भर से अपील की गई थी
छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता बिनायक सेन को देशद्रोह के लिए उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है.
अदालत ने उन्हें नक्सलियों के साथ साँठगाँठ और उनकी सहायता के आरोप में राजद्रोह और विद्रोह का दोषी पाया है.
उनके साथ नक्सली समर्थक नारायण सान्याल और कोलकाता के पीयूष गुहा को भी उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है.
डॉ. बिनायक सेन को मई, 2007 में बिलासपुर से गिरफ़्तार किया गया था.
उन पर आरोप लगाया गया था कि वे नक्सल समर्थक नारायण सान्याल का पत्र भूमिगत नक्सली नेताओं तक पहुँचाने जा रहे थे.

वे दो वर्षों तक जेल में रहे और आख़िर मई, 2009 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें ज़मानत मिल सकी थी.
लेकिन अदालत के इस फ़ैसले के बाद एक बार फिर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है.
बिनायक शुरु से राज्य सरकार के आरोपों का खंडन करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वो नक्सलियों का साथ नहीं देते लेकिन वो साथ ही राज्य सरकार की ज्यादतियों का भी विरोध करते रहे हैं.

सज़ा

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ओर तो इस देश में गैंगस्टर खुले घूमते रहते हैं और दूसरी ओर 30 सालों तक ग़रीबों और आदिवासियों के बीच सेवाकार्य करने वाले को देशद्रोही का दोषी ठहराया जाता है
इलीना सेन, बिनायक सेन की पत्नी
रायपुर में अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीपी वर्मा ने बिनायक सेन, नारायण सान्याल और पीयूष गुहा तीनों को भारतीय दंड विधान की धारा 124 (देशद्रोह) और 120 बी (षडयंत्र) और छत्तीसगढ़ के जनसुरक्षा अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है.
उन्हें ग़ैरक़ानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत भी सज़ा सुनाई गई है. सारी सज़ाएँ साथ चलेंगीं.



बिनायक सेन को अदालत ने नारायण सान्याल का पत्र भूमिगत नक्सली नेताओं तक पहुँचाने का दोषी पाया जबकि पीयूष गुहा नक्सलियों को संगठित होने में सहायता देने का दोषी पाया.
छत्तीसगढ़ पुलिस ने जिस जनसुरक्षा अधिनियम के तहत बिनायक सेन को गिरफ़्तार किया था उस क़ानून का वे तब से विरोध कर रहे थे जब सरकार ने इसे लागू करने का फ़ैसला किया था.
उनका तर्क था कि इस क़ानून का सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के ख़िलाफ़ दुरुपयोग किया जा सकता है.
बहुत से सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस क़ानून को 'पोटा से भी ख़तरनाक' बताया था.

'फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेंगे'

बिनायक सेन की रिहाई के लिए प्रदर्शन
बिनायक सेन की रिहाई के लिए दुनिया भर से आवाज़ें उठी थीं
बिनायक सेन की पत्नी और सुपरिचित सामाजिक कार्यकर्ता इलीना सेन ने इस फ़ैसले का विरोध करते हुए कहा है कि यह दिन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक काला दिन है.
उन्होंने कहा, "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ओर तो इस देश में गैंगस्टर खुले घूमते रहते हैं और दूसरी ओर 30 सालों तक ग़रीबों और आदिवासियों के बीच सेवाकार्य करने वाले को देशद्रोही का दोषी ठहराया जाता है."


विनायक सेन के वकील ने कहा है कि इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील की जाएगी.
जबकि पीयूसीएल की कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव ने भी कहा है कि इस फ़ैसले का अध्ययन करने के बाद उच्च न्यायालय में अपील की जाएगी.

ज़्यादतियों का विरोध

बिनायक सेन
बिनायक सेन ने आदिवासियों के बीच स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत काम किया
डॉ बिनायक सेन मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ शाखा के पदाधिकारी रहे हैं.
इस संस्था के साथ काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौत और कुपोषण जैसे मुद्दों को उठाया और कई ग़ैर सरकारी जाँच दलों के सदस्य रहे.
उन्होंने अक्सर सरकार के लिए असुविधाजनक सवाल खड़े किए और नक्सली आंदोलन के ख़िलाफ़ चल रहे सलमा जुड़ुम की विसंगतियों पर भी गंभीर सवाल उठाए.
सलवा जुड़ुम के चलते आदिवासियों को हो रही कथित परेशानियों को स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया तक पहुँचाने में भी उनकी अहम भूमिका रही.
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाक़े बस्तर में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ चल रहे सलवा जुड़ुम को सरकार स्वस्फ़ूर्त जनांदोलन कहती रही है जबकि इसके विरोधी इसे सरकारी सहायता से चल रहा कार्यक्रम कहते हैं. सलवा जुड़ुम आंदोलन की मानवाधिकार संगठनों ने निंदा की और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाए और आख़िर में छत्तीसगढ़ सरकार को इसे बंद करना पड़ा है.
पेशे से चिकित्सक डॉ बिनायक सेन ने समाजसेवा की शुरुआत सुपरिचित श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के साथ की और श्रमिकों के लिए बनाए गए शहीद अस्पताल में अपनी सेवाएँ देने लगे.
इसके बाद वे छत्तीसगढ़ के विभिन्न ज़िलों में लोगों के लिए सस्ती चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के उपाय तलाश करने के लिए काम करते रहे.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान को उनके कॉलेज क्रिस्चन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर ने भी सराहा और पॉल हैरिसन अवॉर्ड दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जोनाथन मैन सम्मान दिया गया.



    Thursday, December 23, 2010

    जन्म मेरा मुंबई में हुआ, लेकिन जयपुर ने मुझे दूसरी ज़िंदगी दी है ....शक्ति तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक अपनी काली नियति के सामने आत्मसमर्पण न कर दिया जाये। नहीं, अब वापसी नहीं हो सकती। मुझे आगे बढ़ते ही जाना है................ .

    ...जिसने सफलता की गाथा पैरों से लिखी

    सुधा चंद्रन
    सुधा चंद्रन ने नाचे मयूरी फ़िल्म में भी काम किया
    जयपुर फ़ुट ने भारत ही नहीं दुनिया भर में अपने पैर खो चुके लोगों को संबल दिया है.
    लेकिन सुधा चंद्रन जैसे कुछ लोग हैं, जिन्होंने इस कृत्रिम पैर के ज़रिए जिस्मानी कमी को एक क़ाबलियत में तब्दील कर दिया और ऐसा किरदार खड़ा किया जो औरों के लिए मिसाल बन गया.
    सुधा ने जयपुर फ़ुट के सहारे 'नाचे मयूरी' फ़िल्म में अपने नृत्य से सबका मन मोह लिया. सुधा को जयपुर अपना दूसरा घर लगता है, क्योंकि यहीं उन्हें 'जयपुर फुट' लगा.
    पिछले दिनों जयपुर में सुधा चंद्रन ने नृत्य पेश किया तो भरी भीड़ उमड़ी. ना ये सावन था, ना घटाएँ और ना आसमान में कोई बादलो का बसेरा. लेकिन सुधा जब मंच पर आईं तो लगा सैंकड़ों बिजलिया आसमान में कौंध रही हैं.
    सभागार में समाया हर जिस्म रोमांचित था और हर हाथ तालियों से ध्वनि कर सुधा की नृत्य प्रस्तुति की दाद दे रहा था. सुधा ऐसे नाचीं जैसे कोई अराधना स्थल पर इबादत कर रहा हो.
    फिर सुधा लोगों से मुख़ातिब हुईं और कहा- जन्म मेरा मुंबई में हुआ, लेकिन जयपुर ने मुझे दूसरी ज़िंदगी दी है. इतने सालों से मैं नृत्य कर रही हूँ, लेकिन ये पहला मौक़ा है जब मुझे जयपुर में नृत्य करने का अवसर मिला है. ये बहुत ही खुशगँवार मौक़ा है, मेरे लिए इससे बड़ा कोई सम्मान नहीं हो सकता.

    हादसा

    एक हादसे ने सुधा की ज़िंदगी में झंझावात ला दिया. वर्ष 1981 में एक दुर्घटना में सुधा का एक पैर हमेशा के लिए जिस्म से जुदा हो गया.
    मुझे जयपुर फ़ुट से एक पहचान मिली है. हम जैसे लोग इसके सहारे चल रहे है. मैं हादसे के वक़्त बहुत छोटी थी. मैंने बहुत सपने देखे थे, सहसा ये हादसा हो गया और सपने बिखर गए. मेरी माँ सब्जी लेने रात को जाती थी, क्योंकि लोग मेरी विकलांगता को लेकर अप्रिय सवाल पूछते थे. मेरे माता-पिता ने भी दुख झेला है. तभी मैंने प्रण किया कि मुझे ऐसा करना है कि माँ-बाप गर्व करें. वो मैंने किया
    सुधा चंद्रन
    सुधा उन दिनों की याद करते हुए कहती हैं, ''हादसे ने मेरी ज़िंदगी में अँधेरा उतार दिया. मैं भविष्य को लेकर बहुत उदास थी, अपनी माँ के साथ जयुपर आई तो इतनी भर मुराद थी कि मैं चल सकूँ. मैं जयपुर फ़ुट के लोगों से मिली और पूछा क्या मैं कभी चल सकूँगी."
    सुधा ने पूरे सभागार में अपनी कहानी सुनाई तो हर व्यक्ति ने उन्हें ध्यान से सुना. सुधा कहने लगीं- मैंने पूछा क्या मैं नाच भी सकूँगी, तो डॉक्टरों ने कहा बेशक आप नृत्य कर सकेंगी. ये मेरी ज़िंदगी का सबसे अनमोल लम्हा था.
    भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति ने 'जयुपर फ़ुट' को दुनिया भर में पहुंचाया है. इस समिति के प्रमुख डीआर मेहता ने सुधा को पैर खोकर फिर खड़ी होने का प्रयास करते भी देखा है.
    लेकिन जब उन्होंने सुधा को नृत्य करते देखा तो अभिभूत हो गए. वे आशीर्वाद भाव से बोले सुधा ने तो कमाल कर दिया. जीवन के हादसे को अभिशाप से वरदान में बदल दिया. वो बाक़ी लोगो के लिए मिसाल बन गई है.
    सुधा ने 'नाचे मयूरी' फ़िल्म के ज़रिए ज़माने को अपनी क़ाबलियत से रूबरू कराया है. कोई उन्हें टीवी सीरियल के रामोला सिकंद के रूप में जानता है तो वे अपाहिज ज़िंदगियों के लिए एक रोशन किरदार है.
    सिलीगुड़ी की सुष्मिता चक्रव्रती के एक पैर में कमी है. लेकिन उन्होंने सुधा के किरदार से प्रेरणा ली और अब वो मंच पर बखूबी नृत्य करती है.

    गर्व

    सुष्मिता ने बीबीसी कहा- जब मैं उदास होती तो मेरी नानी मुझे सुधा का उदाहरण देती. बस उनको देख कर मैं नृत्य करना सीख गई.
    हादसे ने मेरी ज़िंदगी में अँधेरा उतार दिया. मैं भविष्य को लेकर बहुत उदास थी, अपनी माँ के साथ जयुपर आई तो इतनी भर मुराद थी कि मैं चल सकूँ
    सुधा चंद्रन
    एक वो वक़्त था जब सुधा जयपुर फ़ुट के सहारे ज़िंदगी गुज़ार रही थी. तभी रवि देंग ने उनका हाथ थमा और अपनी जीवन-संगिनी बनाया.
    वे कहते हैं कि उन्हें सुधा पर बहुत गर्व है. सुधा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
    सुधा कहती हैं- मुझे जयपुर फ़ुट से एक पहचान मिली है. हम जैसे लोग इसके सहारे चल रहे है. मैं हादसे के वक़्त बहुत छोटी थी. मैंने बहुत सपने देखे थे, सहसा ये हादसा हो गया और सपने बिखर गए. मेरी माँ सब्जी लेने रात को जाती थी, क्योंकि लोग मेरी विकलांगता को लेकर अप्रिय सवाल पूछते थे. मेरे माता-पिता ने भी दुख झेला है. तभी मैंने प्रण किया कि मुझे ऐसा करना है कि माँ-बाप गर्व करें. वो मैंने किया.
    वो बिजली की मानिंद जब नाचती हैं तो लोग भूल जाते है कि उनके कौन से पैर में जयपुर फ़ुट लगा है. दुनिया में लोग अपनी कामयाबी के किस्से हाथों से लिखते है. लेकिन ये सुधा हैं, सुधा चंद्रन, जिन्होंने अपनी सफलता की गाथा पैरों से लिखी है.

    भारत को दोस्त बनाती दुनिया ,भारत एक ऐसी विवाह योग्य कन्या है जिसके कई दीवाने हैं - एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस देश को दिल्ली में राजनयिकों की एक जमात में कुछ इस तरह से बयाँ किया भारत में रूस के राजदूत अलेक्ज़ेंडर कदाकिन ने.

    भारत को दोस्त बनाती दुनिया

    मेदवेदेव के साथ मनमोहन
    मेदवेदेव का दौरा विदेशी नेताओं के इस वर्ष के भारत दौरे का अंतिम दौरा था
    भारत एक ऐसी विवाह योग्य कन्या है जिसके कई दीवाने हैं - एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस देश को दिल्ली में राजनयिकों की एक जमात में कुछ इस तरह से बयाँ किया भारत में रूस के राजदूत अलेक्ज़ेंडर कदाकिन ने.
    भारत में राजनयिक के तौर पर 20 साल बितानेवाले और धाराप्रवाह हिंदी बोलनेवाले कदाकिन ने चेहरे पर बिना कोई भाव लाए कहा,"रूस भारत की बहन है और चाहती है कि भारत को सबसे अच्छा वर मिले.”
    रूस भारत की बहन है और चाहती है कि भारत को सबसे अच्छा वर मिले
    अलेक्ज़ेंडर कदाकिन, भारत में रूसी राजदूत
    एक ऐसे देश में उनका ये संदेश यूँ ही बेमानी नहीं है जिसने कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी पाँच स्थायी सदस्यों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकारों की मेज़बानी की हो, जिसकी शुरूआत हुई जुलाई में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की यात्रा से.
    पिछले 45 दिनों में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन राष्ट्राध्यक्षों के साथ संयुक्त बयान जारी किए हैं – आठ नवंबर को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ, छह दिसंबर को फ़्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी के साथ, 16 दिसंबर को चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के साथ और 21 दिसंबर को दिमित्री मेदवदेव के साथ.
    साथ ही इस दौरान, मनमोहन सिंह ने इस वर्ष जापान और जर्मनी की यात्रा के लिए भी समय निकालकर ये संकेत दे दिया कि भारत दुनिया की सभी बड़ी आर्थिक ताक़तों से ताल्लुक़ात बना रहा है.
    चीनी प्रधानमंत्री के औपचारिक बयानों पर भरोसा किया जाए तो लगता है कि चीन भी चाहता है कि वैश्विक मंच पर भारत और बड़ी भूमिका निभाए, बावजूद इसके कि दोनों देश अभी भी संभवतः सबसे अधिक समय से अनसुलझे सीमा विवाद में अभी तक उलझे हुए हैं.

    उपलब्धि

    वेन जियाबाओ के साथ मनमोहन सिंह
    चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ एक बहुत बड़ा व्यापारिक दल लेकर भारत गए
    चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापार सहयोगी है जिनका आपसी व्यापार इस वर्ष 60 अरब डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है.
    भारत की ज़मीन से डेविड कैमरन ने पाकिस्तान के विरूद्ध जो कड़े बयान दिए उनका दिल्ली में काफ़ी स्वागत हुआ, विशेष रूप से आक्रामकता में विश्वास रखनेवाले प्रबुद्ध वर्ग में.
    उनको लगा – ब्रिटेन की भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन क़ायम करने की भूमिका का आख़िरकार अंत हो गया.
    रूसी प्रधानमंत्री मेदवेदेव की यात्रा में दोनों सरकारों के बीच 11 समझौते हुए, चुनाव के साझा निष्पादन से लेकर पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के साझा विकास और एक नए इस्पात कारखाने की स्थापना तक.
    भारत पहले ही 2008 में परमाणु पाबंदी के हटने के बाद से परमाणु ईंधन ख़रीद रहा है, ना केवल रूस से बल्कि फ्रांस से भी.
    आयातित परमाणु ईंधनों की बदौलत इसके परमाणु बिजलीघरों से पहले की तुलना में सबसे अधिक बिजली का उत्पादन हो रहा है.
    और, यदि और प्रमाण की ज़रूरत हो, तो भारत एक पूर्ण सदस्य की हैसियत से न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता लेने के लिए तैयार है, वो क्लब जो कि सारी दुनिया के परमाणु व्यापार की देख-रेख करता है.
    एक ऐसे देश के लिए जो दशकों तक परमाणु मामले में अलग-थलग पड़ा रहा, उसके लिए एनएसजी में दाख़िल होना निश्चित तौर पर एक उपलब्धि होगी.
    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विभाग में प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू कहते हैं,"ये दौरे भारत के बढ़ते महत्व का प्रमाण हैं."
    अमिताभ मट्टू के अनुसार भारत को केवल एक बड़े बाज़ार के तौर पर ही नहीं बल्कि सारी दुनिया के लिए निवेश का एक स्रोत भी समझा जाता है जिनमें विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ भी शामिल हैं.
    उन्होंने कहा,"आपको इन सभी यात्राओं को अलग-अलग प्रिज़्म से देखना होगा. मगर ओबामा की यात्रा अलग थी. दुनिया के दूसरे देशों की ही तरह अमरीका के साथ भारत का संबंध सबसे अधिक महत्व रखता है."

    आर्थिक अवसर

    बराक ओबामा
    भारतीय संसद को संबोधित करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा
    अमिताभ मट्टू के अनुसार भारत को केवल एक बड़े बाज़ार के तौर पर ही नहीं बल्कि सारी दुनिया के लिए निवेश का एक स्रोत भी समझा जाता है जिनमें विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ भी शामिल हैं.
    भारत जैसा एक विकासशील देश भी आर्थिक अवसर बन सकता है, इसका संकेत इससे भी मिलता है कि राष्ट्रपति ओबामा अमरीकी निर्यात को बढ़ावा देने और नई नौकरियों के सृजन के उद्देश्य से मुंबई और दिल्ली गए.
    भारतीय विदेश मत्रालय में पूर्व सचिव राजीव सीकरी मानते हैं कि कुछ ही महीनों के भीतर इन सब दौरों का होना एक संयोग भी है.
    लेकिन वे कहते हैं,"संकेत स्पष्ट है, लोग व्यापार करना चाह रहे हैं...और निश्चित तौर पर भारत की वैश्विक छवि के लिए ये अच्छी बात है."
    वैसे ये सभी दौरे ऐसे समय हुए हैं जब मनमोहन सिंह और उनकी गठबंधन सरकार एक कठिन दौर से गुज़र रहे हैं और कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के केंद्र में हैं – मोबाइल फ़ोनों के स्पेक्ट्रम को सस्ता बेचने से लेकर कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान रिश्वत देने के मामलों को लेकर.

    चुनौतियाँ

    मनमोहन सिंह और डेविड कैमरन
    कैमरन ने अपनी भारत यात्रा के दौरान पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़ा संदेश दिया था
    वैसे ये सभी दौरे ऐसे समय हुए हैं जब मनमोहन सिंह और उनकी गठबंधन सरकार एक कठिन दौर से गुज़र रहे हैं और कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के केंद्र में हैं – मोबाइल फ़ोनों के स्पेक्ट्रम को सस्ता बेचने से लेकर कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान रिश्वत देने के मामलों को लेकर.
    डटे हुए विपक्ष ने संसद को ठप्प किया हुआ है जिससे प्रधानमंत्री को इस सोमवार को मजूबर होकर कहना पड़ा कि वे स्पेक्ट्र सौदे की जाँच करनेवाली संसदीय समिति के सामने पेश होने के लिए तैयार हैं.
    मगर विश्लेषकों का मानना है केवल इतना काफ़ी नहीं है कि मनमोहन सिंह की छवि ऐसी है जिसमें वे आलोचनाओं से परे हैं.
    उनकी अपनी सरकार के मंत्रियों पर लगे आरोपों के बारे में क्या कहा जाए? और क्या कॉर्पोरेट जगत के साथ उनके काम-काज पर उनका पर्याप्त नियंत्रण है?
    एक ऐसी गठबंधन सरकार के लिए जो ग़रीबों को अधिकार देने के नाम पर सत्ता में आई, स्पेक्ट्रम सौदे में 40 अरब डॉलर का नुक़सान केवल शर्म की बात नहीं है. ये इस सवाल की ओर भी ले जाता है कि जिस पैसे का नुक़सान हुआ उससे कितने बच्चों की पढ़ाई हो सकती थी और कितने अस्पताल बन सकते थे.
    भारत ने लंबे समय तक भ्रष्टाचार को झेला है, एक ऐसी चीज़ जो उसकी प्रभावशाली आर्थिक वृद्धि के साथ ही जारी रही. भारत में अभी भी उस संस्कृति का विकास होना बाक़ी है जहाँ कि भ्रष्टाचार करनेवालों को सचमुच सज़ा मिलती है.
    भारत की आर्थिक गाथा के टिकाउ रहने के लिए ये ज़रूरी है कि उसकी अंदरूनी प्रक्रिया पारदर्शी हो, ना केवल अपने लोगों के लिए बल्कि बाहर से आनेवाले निवेश के लिए भी.
    क्योंकि बाहर की दुनिया की निगाहें लगीं होंगी, ये देखने के लिए कि भारत कैसे इन विरोधाभासों और चुनौतियों से पार पाता है.

      Tuesday, December 21, 2010

      भ्रष्टाचार के तंत्र में एक जगह हम किसी को लूटते हैं तो दूसरे जगह हमें कोई और लूटता है.एक तरीके से एक दुसरे को लुटने की खुली प्रतियोगिता चल रही है.जो जितना अधिक लूट पा रहा है वह उतना अधिक लूट रहा है. और हम सबसे अधिक भ्रष्ट को सबसे अधिक सम्मान देते हैं.क्या सोचते हैं आप?

      वर्तमान में लोकतंत्र के सारे स्तम्भ दागदार हो गये हैं.लोकतंत्र के पांच स्तम्भ होते हैं--विधायिका,कार्यपालिका,न्यायपालिका,मीडिया और सिविल सोसाइटी(अर्थात हम और आप).काजल की कोठरी में सब काले हैं.2G स्पेक्ट्रम घोटाले में लोकतंत्र के ये सभी स्तम्भ अपने दागदार दामन के साथ एक साथ खड़े हैं.अब समय आ गया है कि एक दुसरे के ऊपर दोषारोपण करना छोड़कर,हम सभी एक साथ जागें,तभी कुछ बदलेगा .नहीं तो कुछ बदलने वाला नहीं है.जे.पी.सी. की मांग सिर्फ राजनीतिक मांग है.यह सच है.एक दुसरे को सिर्फ गलत सिद्ध करने के लिए.उत्तरप्रदेश के पंचायतों के चुनाव में हर कोई बिका और खरीदा.जनता ने शराब और मीट पी-खाकर वोट दिया.खिलाया-पिलाया प्रधान, बी.डी.सी. और जिला पंचायत सदस्यों ने.फिर ब्लाक प्रमुख के चुनाव में बी.डी.सी. सदस्यों ने मीट,मुर्गा,शराब खा-पीकर और पैसा ले  कर वोट  दिया.वही हाल जिला पंचायत सदस्यों का भी रहा.इन्होने भी मीट,मुर्गा,शराब खा-पीकर और पैसा लेकर वोट दिया.अब क्या होगा जानना चाहते हैं आप ?अब जो विकास के लिए पैसा आएगा उसको प्रधान,ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष खायेंगें.भष्टाचार के तंत्र में एक जगह हम किसी को लूटते हैं तो दुसरे जगह हमें कोई और लुटता है.एक तरीके से एक दुसरे को लुटने की खुली प्रतियोगिता चल रही है.जो जितना अधिक लूट पा रहा है वह उतना अधिक लूट रहा है. और हम सबसे अधिक भरष्ट को सबसे अधिक सम्मान देते हैं.क्या सोचते हैं आप?  

      जानिए क्या है जे.पी.सी. और पी.ए.सी.






                         क्‍या है जेपीसी?




      2 स्‍पेक्‍ट्रम आवंटन घोटाले को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस हो रही है. विपक्ष इस घोटाले की जांच जेपीसी से कराना चाहता है तो सरकार कह रही है कि इस घोटाले की पीएसी करने में सक्षम है. तो जानते हैं आखिर क्‍या है जेपीसी?





      जेपीसी अंग्रेजी अक्षर के JPC से बना है, जिसका पूरा मतलब होता है. ज्‍वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी. ज्‍वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी संसद की वह समिति जिसमें सभी दलों को समान भागीदारी हो. जेपीसी को यह अधिकार है कि वह किसी भी व्‍यक्ति, संस्‍था या किसी भी उस पक्ष को बुला सकती है जिसको ले‍कर जेपीसी का गठन हुआ है.





      अगर वह जेपीसी के समक्ष पेश नहीं होता है तो यह संसद की अवमानना का उल्‍लघंन माना जाएगा. जेपीसी संबंधित व्‍यक्ति या संस्‍था से इस बाबत लिखित या मौखिक जवाब या फिर दोनों मांग सकती है.
      भारतीय संसद के इतिहास में अब तक 4 बार जेपीसी का गठन हो चुका है.





      6 अगस्‍त 1987 को पहली बार बोफोर्स घोटाले को लेकर पहली बार जेपीसी का गठन हुआ.





      6 अगस्‍त 1992 को दूसरी बार तब जेपीसी का गठन हुआ जब हर्षद मेहता का शेयर घोटाले की जांच करनी थी.
      26 अप्रैल, 2001 को एक बार फिर शेयर बाजार में हुए घोटाले के कारण जेपीसी का गठन हुआ.





      अगस्‍त 2003 में चौथी और अंतिम जेपीसी का गठन भारत में बनने वाले सॉफ्ट ड्रिंक्‍स और अन्‍य पेय पदार्थों में कीनटाशक होने की जांच के लिए किया गया था.
                       क्‍या है पीएसी?

      2 स्‍पेक्‍ट्रम आवंटन घोटाले को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस हो रही है. विपक्ष इस घोटाले की जांच जेपीसी से कराना चाहता है तो सरकार कह रही है कि इस घोटाले की पीएसी करने में सक्षम है. तो जानते हैं आखिर क्‍या है पीएसी?





      पीएसी अंग्रेजी अक्षर के PAC से बना है, जिसका पूरा मतलब होता है. पब्लिक अकाउंट्स कमेटी. पब्लिक अकाउंट्स कमेटी यानि खर्चे का हिसाब-किताब देखने वाली कमेटी. इस कमिटी का अध्यक्ष विपक्ष का नेता होता है.
      पीएसी कैग की रिपोर्ट की जांच करती है. पीएसी द्वारा तैयार की गई सिफारिश को सरकार मानने के लिए बाध्‍य नहीं है. शायद यही कारण है कि विपक्ष पीएसी नहीं जेपीसी की मांग कर रहा है. वैसे भी भाजपा के लिए पीएसी बहुत शुभ नहीं रहा है.
      पहले जसवंत सिंह जी इसके अध्यक्ष बने, तो वह अपनी किताब लेकर एक तरफ खड़े हो गए और पार्टी दूसरी तरफ. अंतत: पार्टी से निकाले गए, जो फिर भाजपा में शामिल हो चुके हैं. लेकिन अब मुरली मनोहर जोशी इसके अध्यक्ष हैं, जो सरकार के पीएसी के सुर में सुर मिलाते हुए कह रहे हैं कि 2 जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले की जांच करने के लिए पीएसी सक्षम है.

      Monday, December 20, 2010

      Final Statement of Binayak Sen






      Final Statement of Binayak Sen 


      I am a trained medical doctor with a specialization in child health. I
      completed my MBBS from the Christian Medical College, Vellore in 1972, and
      completed studies leading to the award of the degree of MD (Paediatrics) of
      the Madras University, from the same institution in 1976. After this, I
      joined the faculty of the Centre for Social Medicine and Community Health at
      the Jawaharlal Nehru University in New Delhi and worked there for two years,
      before leaving to join a field based health programme at the Friends Rural
      Centre, Rasulia in Hoshangabad, MP. During the two years I worked there, I
      worked intensively in the diagnosis and treatment of Tuberculosis and
      understood many of the social and economic causes of disease. I was also
      strongly influenced by the work of Marjorie Sykes, the biographer of Mahatma
      Gandhi, who lived at the Rasulia centre at that time.

      I came to Chhattisgarh in 1981 and worked upto 1987 at Dalli Rajhara
      (district Durg), where, along with the late Shri Shankar Guha Niyogi and the
      workers of the Chhattisgarh Mines Shramik Sangh, I helped to establish the
      Shaheed Hospital, that continues to practice low cost and rational medicine
      for the adivasis and working people of the surrounding areas upto the
      present. After leaving Dalli Rajhara, I worked to develop a health programme
      among the Adivasi population in and around village Bagrumnala, which today
      is in Dhamtari district. This work depended on a large group of village
      based health workers who were trained and guided by me. When the new state
      of Chhattisgarh was formed, I was appointed a member of the advisory group
      on Health Care Sector reforms, and helped to develop the Mitanin programme,
      which in turn, became the role model for the ASHA of the National Rural
      Health Mission. A copy of the Order of the Department of Health and Family
      Welfare of the Govt. of Chhattisgarh regarding my nomination to the advisory
      group mentioned above is attached. (Annexure 1.)


      My work in the area of community health, as well as my work on Human Rights
      which is detailed below, has been nationally and internationally recognized.
      I have been awarded the Paul Harrison Award by the CMC Vellore in 2004; the
      RR Keithan Gold medal by the Indian Academy of Social Sciences in 2007; and
      have received the Jonathan Mann award for Health and Human rights from the
      Global Health Council in 2008. I am attaching notarized copies of the
      citations of these awards with this statement, and am carrying the originals
      for the perusal of the court. (Annexures 2, 3, 4 and 5)

      I have been a member of the Peoples’ Union for Civil Liberties (PUCL) since
      1981. The PUCL is an organization devoted to the preservation of
      constitutional civil liberties and human rights that was founded by the late
      Shri Jayprakash Narayan during the years of the Emergency. In Chhattisgarh,
      as well as in many other parts of the country, the PUCL led the campaign for
      the preservation of the freedom of speech, prevention of custodial violence,
      and for the public accountability of the police. I became General Secretary
      of the Chhattisgarh unit of the PUCL in 2004, and am currently the President
      of the State unit, and Vice President of its National body.

      In Chhattisgarh, the PUCL has been in the forefront of exposing the
      atrocities of the police. Atrocities by men in uniform against vulnerable
      sections continue to be a serious problem in the state, as the front page
      news item in the “Sunday Times” dated 12th September 2010, annexed hereto as
      Annexure 6 shows. In this situation PUCL’s efforts were always directed
      towards the establishment of good governance and constitutional values. PUCL
      findings and investigations were always made available in the public domain
      through press releases and its own publications. One such Press Release
      reporting investigation into police atrocities in Village Jiramtarai, Thana
      Koylibeda is annexed hereto as Annexure 7. The report of one such
      investigation pertaining to police atrocities in Katgaon (Kanker district)
      was published in the “Navbharat” and “Deshbandhu” newspapers which are
      annexed hereto as Annexure 8 and 9 respectively. A PUCL publication on the
      State of Human Rights in Chhattisgarh is appended to this statement.
      (Annexure 10). In this connection PUCL regularly corresponded with the
      National and State Human Rights Commissions. Copies of some of the letters
      sent to the PUCL by the National Human Rights Commission (collectively) and
      the State Human Rights Commission are attached to this statement. (Annexure
      11 and 12)



      Apart from investigating and documenting many cases of Human Rights abuse
      involving the police, the PUCL has acted as a whistleblower in the matter of
      exposing the true nature of the Salwa Judum. The Salwa Judum, which began in
      the Dantewada district in 2005, has been represented by the state government
      as a spontaneous peoples’ movement against the Maoists active in the area.
      However, an investigation led by the PUCL and involving several other Human
      Rights organizations revealed that it was in reality a state sponsored and
      state funded as well as completely unaccountable vigilante force, to which
      arms were provided by the government. The activities of the Salwa Judum have
      led to the emptying of more than 600 villages, and the forced displacement
      of over 60,000 people. Concerns regarding the activities of the Salwa Judum
      have been expressed by several independent organizations including the
      National Human Rights Commission. International organizations like the
      UNICEF have also voiced serious concern and have invited me to dialogue with
      them about the restoration of normalcy in the region affected by Salwa
      Judum. The Hon’ble Supreme Court has also, on several occasions, expressed
      its grave concern over the activities of the Salwa Judum and the deployment
      of armed vigilantes for the promotion of state policy. This has been widely
      reported in the press. A Table with an indicative list of agencies that have
      made critical observations on the Salwa Judum is attached (Annexure 13). A
      copy of the report on the Salwa Judum by the Chhattisgarh PUCL and other
      organizations (Annexure 14), and copies of the investigation reports on the
      Salwa Judum brought out by the Independent Citizens Initiative and Asian
      Centre for Human Rights are being filed along with this statement (Annexure
      15 and 16 respectively). An invitation from the UNICEF, Chhattisgarh
      Regional Office to participate in a dialogue to seek a resolution to the
      crisis in Dantewada as a fallout of the Salwa Judum is similarly attached to
      my statement (Annexure 17).Press reports in the Hitavada, dated 23.10.2010
      pertaining to the Hon. Supreme Court’s critical observations are attached
      (Annexure no 29), as are Certified copies of Supreme Court orders that make
      critical observations on the Salwa Judum are also being attached (Annexure
      18)

      The PUCL has also, during 2006, organized two major conventions, opposing
      the proposal to enact the Chhattisgarh Special Public Security Act, because
      it has been, and continues to be, our view that this Act contravenes the
      civil liberties assured to us in the constitution. I have expressed these
      views in the Press as well, and am attaching with this submission a copy of
      newspaper carrying a press report of such a convention (Annexure 19), as
      well as a copy of the newspaper “Chhattisgarh” dated 30th March 2006 in
      which my interview appears in this regard. (Annexure 20) A Civil Writ
      Petition (Writ Petition No 2163/2009) challenging the vires of the
      Chhattisgarh Special Public Security Act has been filed by the PUCL in the
      Chhattisgarh High Court. Certified copies of the Court orders admitting this
      petition and issuing notice are being filed along with this statement
      (Annexure 21).

      For all the reasons mentioned above, the Chhattisgarh police and the state
      government have harboured a grudge against me, and the then DGP of
      Chhattisgarh, Mr OP Rathore, has gone on record threatening to take action
      against the PUCL and its office bearers. Copies of a newspaper of 3rd
      January 2006 carrying a report to this effect are attached to my statement.
      (Annexure 22) I have been concerned with the rights of prisoners in my
      capacity as a Human Rights worker and was approached by the family of Mr
      Narayan Sanyal to look after his health and well being after he was brought
      to Raipur jail in 2006. My first visit to him in jail was in the company of
      his family and lawyer. Subsequently, I obtained permission from the police
      authorities for visiting him in jail, and visited him several times, each
      time applying to do so in my capacity as a PUCL office bearer. After my
      visits, I informed his family members about his condition over the
      telephone. During the course of these visits, it was brought to my notice
      that the surgery on his hands that was necessary for medical purposes, was
      being delayed due to communication problems between the jail and the doctors
      in the Raipur Medical College. I played a role in facilitating his surgery
      and kept his family informed about the process. During this period there was
      considerable correspondence between the prisoner’s family, jail
      administration and medical authorities, of which copies were marked to me. I
      attach along with this statement copies of the letter written by Mr Radha
      Madhav Sanyal (brother of Narayan Sanyal) to the Jail Superintendent with a
      copy to me (Annexure 23); copies of my applications to visit Mr Narayan
      Sanyal in jail which were obtained through an application under the RTI
      (Annexure 24); copy of the written permission given to me by Shri BS Maravi,
      Senior Superintendent of Police, Raipur (Annexure 25) and copies of the
      correspondence from the Jail authorities to the medical doctors mentioned
      above with copies marked to me (Annexure 26).




      It was with similar concern for the situation of prisoners that I acted upon
      the letter received in the post from one Madanlal Barkhade about prison
      conditions in the Raipur Central Jail. I released his letter to the press in
      Raipur and attach the newspaper in which the aforesaid letter was published.
      (Annexure 27) The documents seized from my house during the house search on
      19.5.2007 were those of concern to me in the ordinary and transparent
      conduct of my work. Human rights organizations from all over the country
      used to send me books, pamphlets and documents, and there were thousands of
      these lying in my residence, which I also used as my office.


      None of the seized documents had been secretly or clandestinely obtained.
      Document No. A
      19 was sent to me by post by Shri Govindan Kutty, Editor, Peoples’ March.
      Document no A 20, purported to be written by Madanlal Barkhade was similarly
      received by me in the regular post. The document A 21 was sent to me by Dr
      Kalpana Kannabiran, one of the authors of the article, then Professor at the
      National Law School Hyderabad, by e-mail. Article A 22, photocopy of a hand
      written document, and Articles A 23 and A 36 were available for distribution
      at a seminar on the Salwa Judum organized by the Nelson Mandela Centre for
      Peace and Conflict Resolution, Jamia Milia Islamia, New Delhi in January,
      2007, to which I was invited , and were picked up by me there. Article A 24
      was received by me in the post. Newspaper clippings A 25 to A 35 are
      newspaper clippings that I had maintained in furtherance of my interest in
      the emerging situation in Chhattisgarh.


      Several policemen in the search party were involved in the process of the
      search at my house. Having found a document, the person finding it would
      hand it over to Mr Rajput. Mr Rajput would first read it, and then hand it
      over to me for my signature. He would also sign it himself. After we had
      both put our signatures on the document, he would dictate to TI Jagrit what
      was to be written in the seizure memo. Mr Jagrit would then make the entry,
      following which Mr Rajput would then hand over the document to Mr Jagrit. In
      this manner, each document was seized, signed, and entered in the seizure
      memo. None of the documents were signed by the public witnesses in my
      presence. Nor were the documents sealed in my presence. At the end of the
      search process the documents were carried away in a paper bag in an unsealed
      condition. Document A37 was never received by me to sign. It was not in my
      office, and was not seized during the search. It was fabricated after the
      search by the police to implicate me falsely. When the challan in my case
      was filed, my advocate, Mr Amit Banerjee was present in court and received
      the chargesheet on my behalf. A copy of the chargesheet is annexed hereto as
      Annexure 28. Upon going through the charegesheet, we noticed that in the
      copies of articles A 19 to A 24, the signatures of the panch witnesses were
      not present in the documents. Copies of articles A 25 to A 37 were not
      supplied to us at the time. Despite a court order, the contents of the
      computer were copied onto DVDs without the presence of my advocate, and only
      DVDs of selected material from the computer were supplied later during the
      course of the trial. Out of the DVDs supplied, three relate to investigation
      of police atrocities / fake encounters in Golapally, Jiramtarai and Katgaon.
      My images on these tapes are in conversation with the villagers who are
      affected by these atrocities. I have never seen Deepak Chaubey (PW7) until
      the time he testified in the court. I did not introduce Narayan Sanyal to
      him and his story that Narayan Sanyal was arrested from his house is
      patently untrue as, in fact, Sanyal was arrested in Bhadrachalam.
      I submit that my prosecution is malafide; in fact it is a persecution. I am
      being made an example of by the state government of Chhattisgarh as a
      warning to others not to expose the patent trampling of human rights taking
      place in the state. Documents have been fabricated by the police and false
      witnesses introduced in order to falsely implicate me.


      Binayak Sen
      __._,_.___