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Thursday, December 30, 2010

आखिर सच हुआ सपना… कल तक चेहरा कांतिहीन था और पेशानी पर सलवटें थीं, मगर मार्क जब अपने मुल्क के लिए रवाना हुआ तो उसके चेहरे पर वैसा ही ओज था जो कभी युगांडा से भारत आते हुए रहा होगा.

आखिर सच हुआ सपना…

मार्क उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए भारत आए थे.
वो कोई 15 साल पहले युगांडा से ऊंची तालीम का ख्वाब लेकर भारत आया और फिर एक मुकदमे के भंवर में ऐसा फंसा कि उसे वतन लौटने की इजाज़त ही नहीं मिली.
अब लंबी कानूनी जंग के बाद युगांडा से आए मार्क जब बुधवार को जयपुर से युगांडा के लिए रवाना हुआ तो उसकी आँखे नम हो गई. मार्क एक अरसे बाद अपनी धरती को चूमेगा और अपनों से मुखातिब होगा.
ये मार्क की ज़िंदगी का दुस्वपन था. उसका पासपोर्ट पुलिस ने ज़ब्त कर लिया था और उसे देश छोड़ने की अनुमति नहीं थी.
दिल्ली के एक दम्पति मनीष सक्सेना और उनकी पत्नी चारू गुप्ता ने मार्क के वकील सुधीर को फोन कर मदद की पेशकश की और सहायता के लिए 12 हज़ार रुपए का बैंक ड्राफ्ट भेज दिया.
उसके पास ना रहने का ठिकाना था, न आय का कोई ज़रिया. मार्क पेट भरने के लिए घूम-घूम कर घड़िया बेचता था. मगर उसकी अपनी ज़िंदगी की घड़ी में गोया वक्त जैसे ठहर गया हो.

आसान नहीं थी राह

फिर वो घड़ी आई जब मार्क ने पापी पेट की दुहाई देकर अदालत से गुहार लगाई कि या तो उसे वतन लौटने दिया जाए या फिर उसे जेल में भेज दिया जाए. ताकि उसे दो जून की रोटी मिल सके.
अदालत ने उसे युगांडा जाने की इजाज़त दे दी है. उसे इस शर्त पर अनुमति मिली है कि वो दो माह बाद वापस भारत लौट कर कानूनी प्रक्रिया का सामना करेगा.
अपने जीवन के अमूल्य क्षण जयपुर में फ़क्कड़ रहकर और कानूनी लड़ाई में गुज़ार चुके मार्क के लिए अदालत से इजाज़त मिलने के बाद भी घर वापसी की राह आसान नहीं थी.
कल तक चेहरा कांतिहीन था और पेशानी पर सलवटें थीं, मगर मार्क जब अपने मुल्क के लिए रवाना हुआ तो उसके चेहरे पर वैसा ही ओज था जो कभी युगांडा से भारत आते हुए रहा होगा.
सरकार ने उस पर भारत में वीज़ा अवधि से ज्यादा समय रुकने के लिए 12 हज़ार रूपए का जुर्माना और लगा दिया. फिर उसे घर वापसी के लिए हवाई जहाज़ का किराया भी जुटाना था. मगर मार्क की कारुणिक कहानी बीबीसी ऑनलाइन के पर्दे पर आई तो कई हाथ मदद के लिए बढ़ गए.

मदद की पेशकश

दिल्ली के एक दम्पति मनीष सक्सेना और उनकी पत्नी चारू गुप्ता ने मार्क के वकील सुधीर को फोन कर मदद की पेशकश की और सहायता के लिए 12 हज़ार रुपए का बैंक ड्राफ्ट भेज दिया.
चारू आकाशवाणी में पत्रकार हैं कहने लगीं ये तो हमारा फर्ज़ था. मार्क के वकील सुधीर कहते हैं ये मदद मिलने के बाद जयपुर में बहुत लोग प्रेरित हुए और मार्क की यात्रा के लिए पैसे जमा हो गए.
जयपुर में बुधवार को मार्क को विदाई दी गई तो उसके हाथ में 31 हज़ार रूपए का हवाई यात्रा का टीकट, कुछ कपड़े, एक बैग और राह गुज़र के लिए छोटी सी रकम.
मार्क कहता है इन वर्षो में उसने अपनी माँ और एक भाई खो दिया. फिर भी उसके लिए यही बड़ी बात है कि वो अपने वतन वापस लौट रहा है.
कल तक चेहरा कांतिहीन था और पेशानी पर सलवटें थीं, मगर मार्क जब अपने मुल्क के लिए रवाना हुआ तो उसके चेहरे पर वैसा ही ओज था जो कभी युगांडा से भारत आते हुए रहा होगा.

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