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Thursday, December 23, 2010

भारत को दोस्त बनाती दुनिया ,भारत एक ऐसी विवाह योग्य कन्या है जिसके कई दीवाने हैं - एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस देश को दिल्ली में राजनयिकों की एक जमात में कुछ इस तरह से बयाँ किया भारत में रूस के राजदूत अलेक्ज़ेंडर कदाकिन ने.

भारत को दोस्त बनाती दुनिया

मेदवेदेव के साथ मनमोहन
मेदवेदेव का दौरा विदेशी नेताओं के इस वर्ष के भारत दौरे का अंतिम दौरा था
भारत एक ऐसी विवाह योग्य कन्या है जिसके कई दीवाने हैं - एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस देश को दिल्ली में राजनयिकों की एक जमात में कुछ इस तरह से बयाँ किया भारत में रूस के राजदूत अलेक्ज़ेंडर कदाकिन ने.
भारत में राजनयिक के तौर पर 20 साल बितानेवाले और धाराप्रवाह हिंदी बोलनेवाले कदाकिन ने चेहरे पर बिना कोई भाव लाए कहा,"रूस भारत की बहन है और चाहती है कि भारत को सबसे अच्छा वर मिले.”
रूस भारत की बहन है और चाहती है कि भारत को सबसे अच्छा वर मिले
अलेक्ज़ेंडर कदाकिन, भारत में रूसी राजदूत
एक ऐसे देश में उनका ये संदेश यूँ ही बेमानी नहीं है जिसने कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी पाँच स्थायी सदस्यों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकारों की मेज़बानी की हो, जिसकी शुरूआत हुई जुलाई में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की यात्रा से.
पिछले 45 दिनों में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन राष्ट्राध्यक्षों के साथ संयुक्त बयान जारी किए हैं – आठ नवंबर को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ, छह दिसंबर को फ़्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी के साथ, 16 दिसंबर को चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के साथ और 21 दिसंबर को दिमित्री मेदवदेव के साथ.
साथ ही इस दौरान, मनमोहन सिंह ने इस वर्ष जापान और जर्मनी की यात्रा के लिए भी समय निकालकर ये संकेत दे दिया कि भारत दुनिया की सभी बड़ी आर्थिक ताक़तों से ताल्लुक़ात बना रहा है.
चीनी प्रधानमंत्री के औपचारिक बयानों पर भरोसा किया जाए तो लगता है कि चीन भी चाहता है कि वैश्विक मंच पर भारत और बड़ी भूमिका निभाए, बावजूद इसके कि दोनों देश अभी भी संभवतः सबसे अधिक समय से अनसुलझे सीमा विवाद में अभी तक उलझे हुए हैं.

उपलब्धि

वेन जियाबाओ के साथ मनमोहन सिंह
चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ एक बहुत बड़ा व्यापारिक दल लेकर भारत गए
चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापार सहयोगी है जिनका आपसी व्यापार इस वर्ष 60 अरब डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है.
भारत की ज़मीन से डेविड कैमरन ने पाकिस्तान के विरूद्ध जो कड़े बयान दिए उनका दिल्ली में काफ़ी स्वागत हुआ, विशेष रूप से आक्रामकता में विश्वास रखनेवाले प्रबुद्ध वर्ग में.
उनको लगा – ब्रिटेन की भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन क़ायम करने की भूमिका का आख़िरकार अंत हो गया.
रूसी प्रधानमंत्री मेदवेदेव की यात्रा में दोनों सरकारों के बीच 11 समझौते हुए, चुनाव के साझा निष्पादन से लेकर पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के साझा विकास और एक नए इस्पात कारखाने की स्थापना तक.
भारत पहले ही 2008 में परमाणु पाबंदी के हटने के बाद से परमाणु ईंधन ख़रीद रहा है, ना केवल रूस से बल्कि फ्रांस से भी.
आयातित परमाणु ईंधनों की बदौलत इसके परमाणु बिजलीघरों से पहले की तुलना में सबसे अधिक बिजली का उत्पादन हो रहा है.
और, यदि और प्रमाण की ज़रूरत हो, तो भारत एक पूर्ण सदस्य की हैसियत से न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता लेने के लिए तैयार है, वो क्लब जो कि सारी दुनिया के परमाणु व्यापार की देख-रेख करता है.
एक ऐसे देश के लिए जो दशकों तक परमाणु मामले में अलग-थलग पड़ा रहा, उसके लिए एनएसजी में दाख़िल होना निश्चित तौर पर एक उपलब्धि होगी.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विभाग में प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू कहते हैं,"ये दौरे भारत के बढ़ते महत्व का प्रमाण हैं."
अमिताभ मट्टू के अनुसार भारत को केवल एक बड़े बाज़ार के तौर पर ही नहीं बल्कि सारी दुनिया के लिए निवेश का एक स्रोत भी समझा जाता है जिनमें विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ भी शामिल हैं.
उन्होंने कहा,"आपको इन सभी यात्राओं को अलग-अलग प्रिज़्म से देखना होगा. मगर ओबामा की यात्रा अलग थी. दुनिया के दूसरे देशों की ही तरह अमरीका के साथ भारत का संबंध सबसे अधिक महत्व रखता है."

आर्थिक अवसर

बराक ओबामा
भारतीय संसद को संबोधित करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा
अमिताभ मट्टू के अनुसार भारत को केवल एक बड़े बाज़ार के तौर पर ही नहीं बल्कि सारी दुनिया के लिए निवेश का एक स्रोत भी समझा जाता है जिनमें विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ भी शामिल हैं.
भारत जैसा एक विकासशील देश भी आर्थिक अवसर बन सकता है, इसका संकेत इससे भी मिलता है कि राष्ट्रपति ओबामा अमरीकी निर्यात को बढ़ावा देने और नई नौकरियों के सृजन के उद्देश्य से मुंबई और दिल्ली गए.
भारतीय विदेश मत्रालय में पूर्व सचिव राजीव सीकरी मानते हैं कि कुछ ही महीनों के भीतर इन सब दौरों का होना एक संयोग भी है.
लेकिन वे कहते हैं,"संकेत स्पष्ट है, लोग व्यापार करना चाह रहे हैं...और निश्चित तौर पर भारत की वैश्विक छवि के लिए ये अच्छी बात है."
वैसे ये सभी दौरे ऐसे समय हुए हैं जब मनमोहन सिंह और उनकी गठबंधन सरकार एक कठिन दौर से गुज़र रहे हैं और कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के केंद्र में हैं – मोबाइल फ़ोनों के स्पेक्ट्रम को सस्ता बेचने से लेकर कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान रिश्वत देने के मामलों को लेकर.

चुनौतियाँ

मनमोहन सिंह और डेविड कैमरन
कैमरन ने अपनी भारत यात्रा के दौरान पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़ा संदेश दिया था
वैसे ये सभी दौरे ऐसे समय हुए हैं जब मनमोहन सिंह और उनकी गठबंधन सरकार एक कठिन दौर से गुज़र रहे हैं और कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के केंद्र में हैं – मोबाइल फ़ोनों के स्पेक्ट्रम को सस्ता बेचने से लेकर कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान रिश्वत देने के मामलों को लेकर.
डटे हुए विपक्ष ने संसद को ठप्प किया हुआ है जिससे प्रधानमंत्री को इस सोमवार को मजूबर होकर कहना पड़ा कि वे स्पेक्ट्र सौदे की जाँच करनेवाली संसदीय समिति के सामने पेश होने के लिए तैयार हैं.
मगर विश्लेषकों का मानना है केवल इतना काफ़ी नहीं है कि मनमोहन सिंह की छवि ऐसी है जिसमें वे आलोचनाओं से परे हैं.
उनकी अपनी सरकार के मंत्रियों पर लगे आरोपों के बारे में क्या कहा जाए? और क्या कॉर्पोरेट जगत के साथ उनके काम-काज पर उनका पर्याप्त नियंत्रण है?
एक ऐसी गठबंधन सरकार के लिए जो ग़रीबों को अधिकार देने के नाम पर सत्ता में आई, स्पेक्ट्रम सौदे में 40 अरब डॉलर का नुक़सान केवल शर्म की बात नहीं है. ये इस सवाल की ओर भी ले जाता है कि जिस पैसे का नुक़सान हुआ उससे कितने बच्चों की पढ़ाई हो सकती थी और कितने अस्पताल बन सकते थे.
भारत ने लंबे समय तक भ्रष्टाचार को झेला है, एक ऐसी चीज़ जो उसकी प्रभावशाली आर्थिक वृद्धि के साथ ही जारी रही. भारत में अभी भी उस संस्कृति का विकास होना बाक़ी है जहाँ कि भ्रष्टाचार करनेवालों को सचमुच सज़ा मिलती है.
भारत की आर्थिक गाथा के टिकाउ रहने के लिए ये ज़रूरी है कि उसकी अंदरूनी प्रक्रिया पारदर्शी हो, ना केवल अपने लोगों के लिए बल्कि बाहर से आनेवाले निवेश के लिए भी.
क्योंकि बाहर की दुनिया की निगाहें लगीं होंगी, ये देखने के लिए कि भारत कैसे इन विरोधाभासों और चुनौतियों से पार पाता है.

    Saturday, December 18, 2010

    भारत का जीवंत लोकतंत्र, देश की संस्कृति और राष्ट्रवादी प्रकृति अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को बहुत लुभाती हैं...इसका भी गवाह है की भारत एक सामासिक संस्कृति और सहिष्णुता वाला देश है. .जहा सर्वधर्मसमभाव आज भी जिन्दा है................ .भारत के आम मुसलमानों को नहीं लुभाता आतंकवाद .यह भारत की धर्मनिरपेक्षता का साक्ष्य है............

    'आम मुसलमानों को नहीं लुभाता चरमपंथ'

    भारतीय मुसलमान
    विकीलीक्स की ओर से जारी ताज़ा दस्तावेज़ के मुताबिक़ भारत में अमरीका के पूर्व राजदूत डेविड मलफ़र्ड का कहना है कि भारत में 15 करोड़ से ज़्यादा की मुस्लिम आबादी में अधिकतर को चरमपंथ आकर्षित नहीं करता है.
    मलफ़र्ड के अनुसार भारत का जीवंत लोकतंत्र, देश की संस्कृति और राष्ट्रवादी प्रकृति अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को बहुत लुभाती हैं.
    उन्होंने भारतीय संस्कृति की बेहद प्रशंसा की है.
    विकीलीक्स की ओर से जारी इस संदेश में डेविड मलफ़र्ड ने कहा कि अलगाववाद और धार्मिक चरमपंथ भारतीय मुस्लिमों को कम ही प्रभावित कर पाए हैं और ज़्यादातर उदार रास्ते को अपनाते हैं.

    आकलन 

    संदेश में कहा गया है कि भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, जीवंत लोकतंत्र और समग्र संस्कृति मुस्लिमों को सफ़लता और मुख्याधारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करती है और उनका अलगाव दूर होता है.
    अपने नोट्स में उन्होंने ये भी लिखा है कि न केवल विभिन्न संप्रदायों के लोग सदभाव के साथ रहते हैं बल्कि विभिन्न विचारधाराओं के अतिवादी यानी चरमपंथी भी एक साथ रहते हैं.
    मसलन जहाँ हिंदू, मुस्लिम और सिख धर्मों में बहुत से चरमपंथी तत्व हैं वहीं राजनीतिक विचारधाराओं में भी चरमपंथी समुदाय शामिल है.
    इन राजनीतिक चरमपंथियों में नक्सलवादियों और दक्षिणपंथी संगठनों का ज़िक्र शामिल है.







    भारत के आम मुसलमानों को नहीं लुभाता आतंकवाद

    लंदन। भारत में 15 करो़ड से ज्यादा मुस्लिम आबादी में अधिकतर को आतंकवाद आकर्षित नहीं करता। भारत का जीवंत लोकतंत्र, देश की संस्कृति और राष्ट्रवादी प्रकृति अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को बहुत लुभाती है। भारत में अमरीका के पूर्व राजदूत डेविड मलफोर्ड के ये विचार विकीलीक्स की ओर से जारी ताजा दस्तावेजों में सामने आए हैं। मलफोर्ड ने भारतीय संस्कृति की बेहद प्रशंसा की है। डेविड मलफोर्ड ने कहा कि अलगाववाद और धार्मिक चरमपंथ भारतीय मुस्लिमों को कम ही प्रभावित कर पाए हैं और ज्यादातर उदार रास्ते को अपनाते हैं। अमरीकी सरकार को भेजे अपने संदेश में कहा गया है कि भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, जीवंत लोकतंत्र और समग्र संस्कृति मुस्लिमों को सफलता और मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करती है और उनका अलगाव दूर होता है। उन्होंने अपने नोट्स में लिखा कि न केवल विभिन्न संप्रदायों को लोग सदभाव के साथ रहते हैं बल्कि विभिन्न विचारधाराओं के अतिवादी यानी चरमपंथी एक साथ रहते हैं। मसलन के तौर पर जहां मुस्लिम औ सिख धर्मो में बहुत से चरमपंथी तत्व हैं वहीं राजनीतिक विचारधाराओं में भी चरमपंथी समुदाय है। इन राजनीतिक चरमपंथियों में नक्सलवादियों और दक्षिणपंथी संगठनों का जिक्र शामिल है।




    जिहादी ताकतों से दूर ही है हिंदुस्तानी मुस्लिमः US
    18 Dec 2010, 1156 hrs IST,टाइम्स न्यूज नेटवर्क  



     प्रिन्ट ईमेल शेयर सेव कमेन्टटेक्स्ट:



    वॉशिंग्टन ।। भारत के धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रवादी चरित्र का सिक्का मानते हुए अमेरिका ने यह स्वीकार किया है कि भारत के आम मुसलमानों को

    आतंकवाद नहीं लुभा पा रहा है। उन्हें मुख्यधारा की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था से जुड़े रहना ज्यादा फायदेमंद नजर आता है और इस वजह से आतंकवादी संगठनों के लिए भर्ती की गुंजाइश कम हो जाती है।


    विकिलीक्स की ओर से जारी ताज़ा दस्तावेज़ के मुताबिक़ भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत डेविड मलफ़र्ड का कहना है कि भारत में 15 करोड़ से ज़्यादा की मुस्लिम आबादी में ज्यादातर को आतंकवाद आकर्षित नहीं करता है। मलफ़र्ड के अनुसार भारत का जीवंत लोकतंत्र, देश की संस्कृति और राष्ट्रवादी प्रकृति मुस्लिम समुदाय को बहुत लुभाती हैं।

    अपने इस गोपनीय संदेश में डेविड मलफ़र्ड ने कहा कि अलगाववाद और आतंकवाद भारतीय मुस्लिमों को कम ही प्रभावित कर पाए हैं और ज़्यादातर उदार रास्ते को अपनाते हैं। संदेश में कहा गया है कि भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, जीवंत लोकतंत्र और समग्र संस्कृति मुस्लिमों को सफ़लता और मुख्याधारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करती है जिससे उनका अलगाव दूर होता है.

    दिसंबर 2005 में वॉशिंग्टन के अनुरोध पर तैयार कर भेजी गई इस रिपोर्ट में मलफर्ड ने कहा है कि भारत की धर्म निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था लगातार मुस्लिम छात्रों को मुख्यधारा से जोड़ता रहा है। इस वजह से मुस्लिमों के बीच भी एक संपन्न मिड्ल क्लास बना है जो आम भारतीयों की तरह नौकरी के बढे हुए मौकों का फायदा उठाने के लिए अच्छी शिक्षा और अंग्रेजी के ज्ञान का सहारा उपयोगी समझते हैं।
    मलफर्ड ने कहा है कि इस्लामी आतंकवाद की तरफ मुसलमानों के आकर्षित होने के लिए जरूरी है कि वे मुख्यधारा से कटा हुआ महसूस करें। उनके मुताबिक हालांकि मुसलमानों के साथ भेदभाव और अत्याचार के उदाहरण भी मिलते हैं, लेकिन फिर भी कुल मिलाकर परंपरा की पुरानी दीवारें टूट रही हैं। यंग और डाइनामिक मुस्लिम जैसे शाहरुख खान और सानिया मिर्जा भारत के नए यूथ आइकॉन हैं। आज के हिंदुस्तानी मुस्लिम को आतंकवाद से ज्यादा लुभावने अपने ये प्रतीक लग रहे हैं।



    कश्मीर में संदिग्धों को यातनाएं देती हैं भारतीय एजेंसियां: विकीलीक्स

    कश्मीर में संदिग्धों को यातनाएं देती हैं भारतीय एजेंसियां: विकीलीक्स

    विकीलीक्स के दस्तावेजों में भारत को लेकर एक और खुलासा हुआ है. इसमें कहा गया है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियां और पुलिस कश्मीर समेत देश के कई हिस्सों में मानवाधिकारों का हनन करती हैं. लीक हुए दस्तावेज 2005 के हैं. उस समय रेड क्रॉस ने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास को पत्र लिखकर कहा कि कश्मीर में हिरासत में लिए गए संदिग्धों को निर्मम तरीके यातनाएं दी जाती हैं. भारतीय पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों पर आरोप हैं कि वह देश के कई इलाकों में संदिग्धों को हिरासत में लेकर उन्हें करंट लगाती हैं और उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में रखती हैं. इस जानकारी के सामने आने के बाद जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने कहा कि उनके कार्यकाल में कश्मीर में इस ढंग से मानवाधिकार उल्लंघन का कोई मामला नहीं हुआ है.

    Friday, December 17, 2010

    जरा सोचिये कि जो फैसला सोनिया गाँधी ने 1968 में अपने माता-पिता का विरोध करके राजीव जी के साथ शादी करने का लिया था अर्थात देश और परिवार दोनों छोड़ने का फैसला.और आज हममे से कितने लोग इस तरह का फैसला कर पाते हैं,प्रेम तो हम भी करते हैं लेकिन निर्णय के समय माँ -बाप के विरोध के पल्लू का सहारा लेकर प्रेम की सारी कसमें-वादे पल भर में तोड़ देते हैं.क्या होता है कैसा होता होगा वो प्रेम जो किसी को देश और परिवार छोड़ने को मजबूर कर देता है......... 'माता-पिता सोनिया की शादी के ख़िलाफ़ थे'

    'माता-पिता सोनिया की शादी के ख़िलाफ़ थे'

    सोनिया गांधी के माता-पिता राजीव गांधी के साथ उनकी शादी के ख़िलाफ़ थे लेकिन सोनिया ने उनका विरोध किया और अपनी मर्ज़ी से शादी की.
    विकीलीक्स के अनुसार सोनिया ने अपनी ये निजी बातें कैलिफ़ोर्निया के पूर्व गवर्नर आर्नल्ड स्वार्ज़नेगर की पत्नी मारिया श्राइवर को एक घंटे की मुलाक़ात के दौरान बताई थीं.
    भारत में अमरीकी दूतावास के एक अधिकारी ने चार अगस्त, 2006 को ये उस मुलाक़ात की पूरी जानकारी वाशिंगटन भेजी थी.
    विकीलीक्स पर जारी उस केबल में लिखा गया है कि आमतौर पर सार्वजनिक ज़िंदगी में रिज़र्व रहने वाली सोनिया ने मारिया श्राइवर के साथ काफ़ी खुलकर बात की.

    'बाध्य होकर राजनीति में आईं'

    अपनी राजनीतिक ज़िंदगी की बात करते हुए उन्होंने कहा कि “भारत में दक्षिणपंथ काफ़ी मज़बूत हो रहा था और कांग्रेस कमज़ोर”...और इसीसे गांधी परिवार की धरोहर को बचाने के लिए उन्हें “बाध्य” होकर राजनीति में कूदना पड़ा.
    लीक हुई केबल के अनुसार सोनिया ने ये भी बताया कि उनके बच्चे इस कदम के पूरी तरह से हक़ में नहीं थे लेकिन फिर बाद में उन्होंने कहा, “आप जो भी फ़ैसला करेंगी, हम आपके साथ हैं.”

    दस्तावेज़ के अनुसार सोनिया ने कहा कि प्रधानमंत्री पद नहीं स्वीकार करने के पीछे की पूरी कहानी पर कभी वो किताब लिखेंगी.
    प्रधानमंत्री का पद ठुकराने के फ़ैसले की वजह पर वो बहुत खुलकर नहीं बोलीं.
    विकीलीक्स के अनुसार उनका कहना था, “मुझसे अक्सर इस बारे में पूछा जाता है लेकिन आप लोगों से कह सकती हैं कि किसी दिन इस पूरी कहानी पर मैं किताब लिखूंगी.”
    उन्होंने बस इतना कहा कि उन्हें “अच्छा लगा” जब कोई और प्रधानमंत्री बन गया और उन्हें अपने फ़ैसले पर “कोई अफ़सोस नहीं है”.
    उन्होंने ये भी कहा कि उनपर पार्टी कार्यकर्ताओं का ख़ासा दबाव था क्योंकि वो समझ नहीं पा रहे थे कि जब जनता ने उनके लिए वोट किया है तो फिर वो पद क्यों नहीं स्वीकार कर रही हैं.
    मारिया श्राइवर उनसे महिलाओं से जुड़ी समस्याओं पर बात करने भारत आई थीं और तीन अगस्त को उन्होंने सोनिया से मुलाक़ात की.
    अमरीकी दूतावास के अधिकारी ने वाशिंगटन को भेजी गई अपनी निजी टिप्पणी में लिखा है कि अपने पारिवारिक हादसों के बाद सोनिया गांधी ने अपने इर्द गिर्द एक ऐसा व्यक्तित्व खडा़ किया है जो उनकी निजी ज़िंदगी में सार्वजनिक पैठ को रोकता है.
    टिप्पणी के अनुसार जब भी उन्होंने अपने पति या सास की मृत्यु की बात की उन्हें अपनी भावनाओं को काबू में रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा.
    दूतावास के अधिकारी के अनुसार, “बेहद सावधानी से बनाई भारतीय छवि के बावजूद, उनका इतालवी व्यक्तित्व बेहद स्पष्ट रूप से उनकी आदतों, बातों, हाव भाव और रूचियों में झलकता है.”

    जब वेदान्ता पेड़ों की कटाई कर रही थी तो सरकार कहाँ सो रही थी?जिनका काम निरीक्षण करना था वे लोग क्या कर रहे थे?फिर पर्यावरण का क्या होगा?और फिर कैसे रुकेगा नक्सलवाद/माओवाद..................... वेदांता ने की सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना............

    वेदांता ने की सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना

    बाल्को में निर्माण कार्य (फ़ाइल फ़ोटो)
    बीबीसी के पास उपलब्ध दस्तावेज़ों से पता चलता है कि वेदांता रिसोर्सेस की सहयोगी संस्था स्टरलाइट इंडस्ट्रीज़ (इंडिया) लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए कई एकड़ वन भूमि पर पेड़ों की कटाई की है.
    यह कटाई छत्तीसगढ़ के कोरबा में स्टरलाइट के नियंत्रण वाली भारत अल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को) में हुई है.
    वहाँ सिर्फ़ पेड़ों की कटाई ही नहीं हुई है बल्कि बाल्को क़ानून का उल्लंघन करते हुए एक नया स्मेल्टर प्लांट और एक बिजली घर भी बना रहा है. इसी निर्माणाधीन बिजली घर की चिमनी पिछले साल सितंबर में गिर गई थी जिसमें कम से कम 40 लोग मारे गए थे.
    सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी रही बाल्को में अब स्टरलाइट का हिस्सा 51 फ़ीसदी है. दस्तावेज़ बताते हैं कि बाल्को ने 1751 एकड़ की वन भूमि पर कब्ज़ा कर रखा है जिसका भू-स्वामित्व उसके पास नहीं है. इस भूमि पर बिना पूर्व अनुमति के बहुत सी ग़ैर-वन गतिविधियाँ भी चलाई जा रही हैं.
    स्टरलाइट के अधिकारी इन आरोपों का खंडन करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने सिर्फ़ उसी भूमि पर पेड़ों की कटाई की है जो निजी भूमि है न कि सरकारी वन भूमि.
    लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार के दस्तावेज़ बताते हैं कि बाल्को में सरकारी वन भूमि पर पेड़ों की कटाई हुई और बहुत सी ऐसी गतिविधियाँ हुईं जिससे वन को नुक़सान पहुँच सकता है. उदाहरण के तौर पर कोरबा के तहसीलदार ने 26 अक्तूबर 2010 को जारी पत्र में और कोरबा के वन मंडलाधिकारी ने दो जून 2008 को जारी पत्र में इसके विवरण दिए हैं.
    वेदांता रिसोर्सेस का नाम हाल ही में उड़ीसा के नियामगिरी को लेकर चर्चा में आया था. वहाँ पर्यावरण को होने वाले नुक़सान को लेकर सरकार ने बॉक्साइट के खनन की अनुमति वापस ले ली थी.

    सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी

    बाल्को का सैटेलाइट चित्र
    बाल्को : तीन मार्च, 2008 को सुप्रीम कोर्ट की रोक के तुरंत बाद का सैटेलाइट चित्र
    सैटेलाइट से लिया गया बाल्को का चित्र
    बाल्को: दो जून, 2010 को लिया गया चित्र जिसमें वन/वनस्तपतियों की कमी स्पष्ट दिख रही है
    बाल्को में वेदांता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की जाँच ख़ुद सुप्रीम कोर्ट भी करवा रहा है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की वन मामलों की समिति, सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी (सीईसी) की एक रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 फ़रवरी, 2008 को बाल्को के कब्ज़े वाली भूमि पर किसी भी तरह से पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी थी.
    लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि बाल्को ने सु्प्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए उस भूमि पर भी पेड़ों की कटाई की जो सरकारी रिकॉर्ड में वन भूमि है और वहाँ भी पेड़ों की कटाई की जिसे उसने निजी भू-स्वामियों से हासिल किया था.
    इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट में दो जनहित याचिकाएँ दायर की गई थीं. एक कोरबा के स्वयंसेवी संगठन सार्थक की ओर से और दूसरा छत्तीसगढ़ के कांग्रेस पार्टी के नेता भूपेश बघेल की ओर से.
    इस जनहित याचिका के अलावा याचिकाकर्ता भूपेश बघेल ने सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का भी एक मामला दायर किया है. इस याचिका में उन्होंने बाल्को के अधिकारियों को अवमानना के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है जिसमें वेदांता के प्रमुख अनिल अग्रवाल शामिल हैं.
    जब बीबीसी हिंदी ने भूपेश बघेल से संपर्क किया तो उन्होंने कहा, "मैंने सीईसी के समक्ष पर्याप्त सबूत पेश कर दिए हैं जिससे यह ज़ाहिर होता है कि बाल्को में सुप्रीम कोर्ट के रोक की अनदेखी की गई. यह स्पष्ट तौर पर सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना का मामला है."
    उन्होंने कहा, "अब यह सीईसी पर है कि वह सबूतों की जाँच करे."
    जबकि सार्थक के संचालक लक्ष्मी चौहान ने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह बड़ा मामला है और सीईसी को ख़ुद बाल्को आकर देखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना हुई है."

    खंडन और सबूत

    बाल्को में निर्माण कार्य
    बाल्को में संयंत्र के विस्तार के लिए निर्माण कार्य तेज़ी से चल रहा है
    स्टरलाइट या वेदांता के अधिकारियों ने बीबीसी हिंदी के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में और सीईसी में प्रस्तुत दस्तावेज़ों में उसने इन आरोपों का खंडन किया है.
    वेदांता के अधिकारियों का कहना है कि पेडों की कटाई ज़िला अधिकारियों की अनुमति से और निजी भूमि पर ही हुई है और सुप्रीम कोर्ट ने निजी भूमि पर पेड़ों की कटाई पर कोई रोक नहीं लगाई थी.
    उनका कहना है कि वन भूमि पर कोई कटाई नहीं हुई है.
    लेकिन बीबीसी हिंदी के पास वो दस्तावेज़ उपलब्ध हैं जो इस दावे को ग़लत साबित करते हैं.
    हैदराबाद स्थित एक निजी एजेंसी ने रिमोट सेंसिंग टेक्नालॉजी की मदद से बाल्को संयंत्र के क्षेत्र का आकलन किया है.
    इसके लिए एजेंसी ने बाल्को संयंत्र क्षेत्र के 14 दिसंबर, 2006 के सैटेलाइट चित्र और इंडियन रिसर्च ऑर्गेनाइज़ेशन (इसरो) के तीन मार्च, 2008 और दो जून, 2010 के सैटेलाइट चित्रों की तुलना की है.
    दोनों चित्रों की तुलना करने पर पता चलता है कि बाल्को संयंत्र क्षेत्र में इस दौरान पेड़ों की संख्या में बहुत कमी आई है.
    29 फ़रवरी 2008 और दो जून, 2010 के बीच वन/वनस्पतियों को नुक़सान पहुँचा है. यह नुक़सान 35.79 हेक्टेयर या लगभग 90 एकड़ के क्षेत्र में हुआ है
    सैटेलाइट चित्रों के विश्लेषण पर रिपोर्ट
    इस एजेंसी ने सैटेलाइट से मिले आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद अपनी रिपोर्ट में लिखा है, "29 फ़रवरी 2008 और दो जून, 2010 के बीच वन/वनस्पतियों को नुक़सान पहुँचा है. यह नुक़सान 35.79 हेक्टेयर या लगभग 90 एकड़ के क्षेत्र में हुआ है."
    एजेंसी अपनी रिपोर्ट में कहती है, "वन/वनस्पतियों को नुक़सान बाल्को संयंत्र परिसर के उत्तरी इलाक़े में हुआ है जो मुख्य रुप से 'दो पेड़ों'के प्रतीकों से दर्शाया गया है. "
    'दो पेड़ों' का प्रतीक सरकार के राजस्व रिकॉर्डों में बड़े झाड़ के जंगल के लिए उपयोग में लाया जाता है.
    याचिकाकर्ताओं के अनुसार ये सारे सबूत अब सुप्रीम कोर्ट के वन मामलों की समिति सीईसी के पास है जिसने अवमानना के मामले में सुनवाई पूरी कर ली है और अब वह अंतिम रिपोर्ट तैयार कर रही है.

    वन भूमि पर कब्ज़ा और कटाई

    पहले बाल्को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हुआ करती थी. वर्ष 2001 में भारत सरकार ने बाल्को का विनिवेश करने का फ़ैसला किया था. वेदांता की भारतीय सहयोगी कंपनी स्टरलाइट ने 551 करोड़ रुपए में बाल्को के 51 फ़ीसदी शेयर ख़रीद लिए थे.
    इस सौदे के ज़रिए स्टरलाइट को बाल्को में एक लाख टन के एक स्मेल्टर प्लांट, एक अल्यूमिनियम रोलिंग प्लांट, 270 मेगावॉट के एक कैप्टिव पॉवर प्लांट और 2,780 एकड़ भूमि पर कब्ज़ा मिल गया था.
    बाल्को में हुई दुर्घटना (फ़ाइल फो़टो)
    सरकारी अधिकारी कहते हैं कि जहाँ निर्माणाधीन चिमनी गिरी वह सरकारी ज़मीन है और वहाँ जंगल दर्ज है
    ऐसा प्रतीत होता है कि बाल्को ने इस सौदे के समय भूमि के स्वामित्व की ठीक तरह से जाँच नहीं की क्योंकि जो भूमि उसे कब्ज़े में मिली उसमें निजी और वन भूमि भी थी.
    लेकिन जब भू-स्वामित्व का विवाद सामने आया तो छत्तीसगढ़ सरकार ने इसकी जाँच के लिए एक समिति का गठन किया. वर्ष 2005 में अपनी रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ सरकार की समिति ने कहा था कि कुल 1,751 एकड़ भूमि राजस्व वनभूमि है और बाल्को को पास इसके उपयोग की कोई अनुमति नहीं है.
    इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दोनों जनहित याचिकाएँ दायर की गईं जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी से इस मामले की जाँच करने को कहा.
    सीईसी ने 17 अक्तूबर को अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि बाल्को के पास भू-स्वामित्व नहीं है लेकिन उसे इस मामले में 'पोस्ट फ़ैक्टो क्लियरेंस' यानी आधिपत्य के आधार पर उपयोग की अनुमति दी जा सकती है. लेकिन बाल्को ने सीईसी की रिपोर्ट को स्वीकार करने की जगह इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फ़ैसला किया.
    इस चुनौती याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29, फ़रवरी, 2008 में बाल्को में पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगा दिया.
    इस समय बाल्को में संयंत्र के विस्तार का कार्य चल रहा है. वहाँ एक नया स्मेल्टर प्लांट और एक नए बिजली घर की स्थापना की जा रही है.
    दस्तावेज़ बताते हैं कि इस विस्तार कार्य के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की है जिसमें वन भूमि के पेड़ भी शामिल हैं.