दिल्ली में खुले आसमान के नीचे रात बिताने वालों में काफी संख्या में बच्चे और महिलाएँ शामिल हैं. जो छत की कमी के चलते सड़क पर रात बिताने को मजबूर हैं.
Thursday, December 16, 2010
ठिठुरती दिल्ली, रैनबसेरों का सहारा नहीं ;मनमोहन सिंह जी,आप देख पा रहे हैं इन जीते जागते इंसानों को ,ये हमारे ही देश के नागरिक हैं,जिन्होंने आपको,शीला दीक्षित जी और सोनिया जी को वोट दिया है,तभी तो आप लोग वहां बैठे हैं जहाँ तक हम आम आदमी पहुच नहीं सकते ,और आप को हमारी ठण्ड भरी रातें दिखाई नहीं देती,न मध्य प्रदेश के किसान की आत्म हत्या दिखाई देती है. हम गरीबों की ठण्ड.दिखे भी कैसे हमारे टैक्स के रूप में दिए गये पैसे से आपके घरों में ए.सी.,गीजर, जो लगा है,और महंगे कम्बल पता नहीं कश्मीर या किस देश से आप ने हमारे पैसों से खरीदा होगा.और हमारे दिए गये पैसे से लाल बत्ती लगी गाड़ियों में जिसमें भी ए.सी.भी लगा होगा तो ठण्ड नहीं पहुचती होगी..ना.....................
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